प्लास्टिक नगर निगम के लिए सिरदर्द बनता जा रहा

शहर में प्लास्टिक थैली,डिस्पोजल चाय की प्याली, ग्लास व डिब्बे ,थर्मोकोल की थालियां व अन्य प्लास्टिक सामान का रोज फैल रहा कचरा नगर निगम के लिए सिरदर्द बनता जा रहा है। इसे निपटाने में निगम की अब सांसे फूलने लगी है। रौतनिया में निगम के कचरा डम्पिंग स्थल पर कचरे का पहाड़ सा खड़ा हो गया है। इसमें 25 से 30 फीसदी प्लास्टिक कचरा है। शहर का यह हाल साढ़े तीन साल पहले शहर में प्लास्टिक के थैले में सामान की बिक्री पर रोक लगाने के बाद है। पूर्व मेयर वर्षा सिंह ने इसके लिए स्टैंडिंग क्वप्रस्ताव भी पारित किया था। यही नहीं बीते वर्ष भी 50 माइक्रोन के पॉलीथिन पर सॉलिड वेस्ट मैंनेजमेंट के तहत रोक लगाने का निर्णय लिया गया था। इस बारे में नगर आयुक्त संजय दूबे से पूछने बताते हैं कि निगम ने सौ फीसदी प्लास्टिक कचरे के निष्पादन के लिए योजना बनाई है। पूरे शहर से डोर-टू- डोर कूड़े के कलेक्शन कर गीला कचरे से खाद बनाने और सुखे कचरे की बिक्री की योजना बनाई गई है। इसके लिए सतना सीमेंट कम्पनी से बातचीत हुई है। कम्पनी ने एक साथ 9 टन प्लास्टिक कचरा होने पर इसकी खरीद करने का प्रस्ताव दिया है। शीघ्र ही प्लास्टिक थैली को प्रयोग से बचने के लिए लोगों को जागरूक किया जाएगा। साथ ही 50 माइक्रोन से कम के पॉलीथिन के प्रयोग पर रोक लगाई जाएगी।

प्लास्टिक कचरे को लेकर प्रदूषण बोर्ड का निगम को फरमान

– प्लास्टिक कचरे को एकत्र कर,सुखा व गीला कचरा को अलग कराये व प्लास्टिक कचरे का समुचित डिस्पोजल कराये

-प्लास्टिक कचरे से पर्यावरण को नुकसान न हो यह भी सुनिश्चित करें

-प्लास्टिक कचरे के सार्वजिनक स्थल पर जलाने पर रोक लगाना सुनिश्चत करें

-50 माइक्रोन से कम के पॉलीथिन के प्रयोग पर रोक लगाना

– प्लास्टिक के रिसाइिकल पर नजर रखना सुनिश्चित करें

यह है हाल-

सुविधा का पर्याय बन चुकी पॉलीथिन अब एक बड़ा सिरदर्द बनती जा रही है। इसके नष्ट नहीं हो पाने के कारण भूमि की उर्वरक क्षमता लगातार खत्म हो रही है। भूगर्भीय जल भी दूषित हो रहा। यही नहीं इसे जलाने पर निकलने वाला धुआं ओजोन परत को नुकसान पहुंचाता है। यह ग्लोबल वार्मिंग का मुख्य कारण है। इस समय शहर में हर दिन शहर में 50 टन से ज्यादा प्लास्टिक कचरा जमा होता है और इसमें हर साल दस फीसदी की बढ़ोत्तरी हो रही है। इसमें सबसे ज्यादा पॉलीथिन है।यही नहीं इस्तेमाल में आने वाले पॉलीथिन के 50 माइक्रोन के होने के कारण इसकी रीसाइकलिंग एक प्रतिशत से भी कम हो पाती है। इसके कारण हर साल लाखों पशु-पक्षी पॉलीथिन के कचरे से मर रहे हैं।

Input : Hindustan

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