जब मिथला के राजा जनक के राज्य में सुखे से नदी-नाले,कूप तालाव,सभी जल विहीन हो गये,सम्पूर्ण आकाश लाल चहूओर दूरभिक्ष से कोहराम,कोलाहल की बिकट स्थिति हो गयी। तब राज पुरोहितों,विधिज्ञों के परामर्श से महाराजा जनक स्वंय हल चलाते हलेश्वर स्थान से चले,पुनौरा धाम,सीतमढ़ी में हलटोन के नोक पर सोने के पात्र में माँते सीता भूमि देवी के गोद से उद्भव हुई।तक्षण नीलेआकाश सेअमृत जल के फुहार में हर्षों उल्ला स से राजपंक्षी मोड़-मयुर के साथ देवगण ऋषि मुनी,मानव, पशु-पक्षी,सभी जीव-जन्तु भाव विहबल होकर नाच उठे।

महर्षि वाल्मिकी के अनुसार मिथला के महाराजा शीरध्वज्य उर्फ जनक एवं महा रानी सुनैया(सुनैना) को कोई संतान नहीं थी। वे भूमि पुत्री को गोद लेकर अपनी पुत्री घोषित कर संतान सुख के साथ जग में पापहरणी सीता माँते को पाल कर अंहकारी राक्षषराज रावण का विनाश एवं रामराज्य की कल्पना को साकार किये।

ज्ञातव्य हो हल के नोक को सीता कहा जाता है,जिसके कारण सीता नामित हुई। महाराजा जनक को बिदेह कहा जाता था, जिसके फलस्वरूप बैदेही नामाकरण भी प्रचलित हुई।

हिन्दु धार्मिक पुस्तकों से प्रकट होता है कि दूबारे पुन:जन्म अनुसार रावण एवं मंन्दोद्री पुत्री थी।

पौराणिक कथायों में वेदवती धार्मिक नारी थी,जो भगवान विष्णु से शादी करना चाह रही थी।वह लौकिक जीवन में नदी किनारे तटबंध पर आश्रम निर्माण कर महातप कर तपस्वीनी, सन्यासी जीवन व्यतित कर रही थी।एक रोज ध्यान, चिंतन में मग्न थी। उसकी सौन्दर्य, सम्मोहन से सम्मोहित हो राक्षष राज रावण विमूढ़,दीवानापन में बल प्रयोग से कुक्रीत्य करने का प्रयास किया। वह दैवी शक्ति से उछल कर हवन के लिए बने अग्नी कुंण्ड में कुद गयी।जलने से पहले शाप् दे गयी।आकाश वाणी हुई कि दूसरे जन्म में वह जन्म लेकर रावण के मौत की कारण बनेगी।

तत्पश्चात दूसरे जन्म में रावण पुत्री के रूप में मंदोद्री के गर्भ गृह में जन्म ली।

दार्शनिकों,राजपुरोहितों के कथन अनुसार रावण के मृत्यु की कारण बनने की अाशंकाओं को मूल से विनाश करने के दृष्ट्री कोन से रावण अपने प्राण रक्षार्थ उस अबोध बच्ची को गहरे समुन्द्र की धारा में फेक दीये।बच्ची को समुन्द्री देवता परमेश्वर वरूणी नदीतल में धीरे-धीरे बहते हुए समुन्द्री तटबंध किनारे धरती माँते की गोद मे स्मर्पित कर दी।तत्पश्चात भूदेवी,धरती माँते महराजा जनक को वही बच्ची सुपूर्द कर दी।कालान्तर में यही जगत जननी माँते सीता पापहरणी ,अंहकारी राक्षष राज रावण के विनाश की कारण सिद्ध हुई तथा मर्यादा पुर्षोत्म राम के साथ वन में भटक कर नारी की मर्यादा को गौरवान्वीत की।

साथ ही जन्म स्थली सीतमढ़ी,पालन-पोषन स्थली जनकपुर (नेपाल)में पैत्रिक राजा जनक का महल एवं बिबाह हेतु प्रतिज्ञा शर्त,धनुष यज्ञ स्थल धनुषा जनकपुर बिदाई की (बाट)राह में विश्रामस्थल पंथपाकर,देवकुली,आदी के साथ ससुरालअयोध्या में महाराजा दशरथ के यश पराकर्म की अमर गाथायें चिर संस्मरणीय सदैव पुज्यनीय बना गयी।

  • हलेश्वर स्थान – महाराजा जनक जब दूर्भिक्ष,कोलाहल,कोहराम से त्राण एंव संतान की मनोकामना लेकर हलेश्वर धाम महादेव पूँजा,अर्चना कर हल चलाना प्रारंभ किये। तब पुनौराधाम में भूमिदेवी के गोद में हल के नोक पर सोने की पात्र में एक,बच्ची  मिली।चहूदिशायों में प्रकाश बिखर गया। नीले आकाश से पुष्ष बृष्ट्री के साथअमृत जल फुहार की वर्षा से देव गण,ऋषि-मुनी, मानव,पशु-पक्षी, सभी जीव-जन्तु हर्ष उल्लास से भाव-वभोर  होकर राज पंक्षी मोड़-मयुर के साथ नाच उठे। राजा जनक ,रानी सुनैया(सुनैना) की मनोकामना पूर्ण हुई। यही मान्यताये है कि हलेश्वर स्थान महादेव के पूँजा,अर्चना से मनोकामना पूर्ण होती है।जानकी सर्किट में दर्शणीय स्थल है।
  • जनकपुर धाम,नेपाल – महाराजा जनक का राज दरवार,जहाँ सीतमढ़ी से भूमि देवी पुत्री सीता को राजा जनक गोद लेकर लालन,पालन,पोषण एवं सफल धनुष यज्ञ शर्त पश्चात भगवान राम से व्याह रचा कर अयोध्या के लिए विदा किये।यह विशाल राजमहलआज दर्शणीय भव्य मंदीर है।सीतामढ़ी से भिठ्ठा मोड़ भारत-नेपाल सीमा पार कर सुगम मार्ग से दर्शणीय है।महल में मर्यादा पुर्षोतम भगवान राम एवं माँते सीता विबाह मंडप,हवन कुण्ड,शोभा यात्रा आदी की विस्तृत झांकियाँ दर्शनीय है।
  • धनुष – माँते सीता के लिए योग्य पति की तलास में महाराजा जनक के शर्त “भगवान परशुराम के धनुष यज्ञ में महाप्रतापि विजेता”से ही धनुष यज्ञो परान्त सीता की शादी होगी।यही यज्ञ स्थल है।जहाँ आज भी धनुष का अवशेष पुज्यनीय, दर्शनीय है। यह विदेश नेपाल में जनकपुर से निकट है। सभी धार्मिक वृति के लोग पैदल परिक्रमा में दर्शण-पुँजा करते है।
  • अहिल्या स्थान,उचैठ भगवती माँते स्थली,अन्हारी मनोकामना महादेव,देवकुली भुनेश्वरनाथ महादेव धाम आदी माँते सीता एवं भगवान राम के दर्षणीय पुज्यनीय स्थल है।

Photo Credit  : Tushar Rai Photography

 

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