ऐलान होता है, बारह साल से कम उम्र की बच्ची के साथ बलात्कार किया तो फाँसी होगी.

उसके अगले ही दिन ख़बर आती है,

– चार महीने की बच्ची के साथ बलात्कार और बलात्कार के बाद गला दबा कर हत्या.

– पड़ोसी के घर टीवी देखने गयी दस साल की बच्ची का अपहरण कर उसके साथ बलात्कार और बाद में हत्या. शव घर से कुछ दुरी पर खेत में मिला.

यह तो महज़ बानगी भर है. इसके अलावा देश के अलग-अलग हिस्सों में और भी बलात्कार हुए होंगे. लड़कियां छेड़ी गयी होंगी. मोलेस्टेशन हुआ होगा जिनकी कोई ख़बर नहीं बनी.

 

 

तो अब ज़रा सोचिये कि क्या क़ानून बना देने भर से अपराध रुक जायेगा? नहीं, क़ानून तो पहले भी थे ही न जब तक की उन पर अमल न किया जाये. साथ ही साथ बलात्कार आखिर होता क्यों है. इसके पीछे के मनोवैज्ञानिक और समाजिक पहलुओं पर भी सोचना जरुरी है.

हम जब बलात्कार की ख़बर सुनते हैं तो गुस्से से उबलने लगते हैं, फांसी की मांग, कैंडल मार्च और विरोध-प्रदर्शन करते हैं और ये होना भी चाहिए लेकिन साथ ही साथ में उन पहलुओं पर भी सोचना चाहिए कि आख़िर बलात्कारी ने कब और किस मनोदशा में इस कुकृत्य को अंजाम दिया होगा?

क्या वो घर से सोच कर निकला होगा कि आज उसे बलात्कार करना है और किसी दूधमुँही बच्ची का ही करना है? क्या वो इससे पहले और भी इस तरह की किसी घटना को अंजाम दे चूका है?

मोटे तौर पर इसका जवाब होता है, नहीं ऐसा नहीं होता है. कोई भी बलात्कारी घर से यह सोच कर नहीं निकलता है. इनफैक्ट कोई भी इंसान पहले दिन किसी का बलात्कार करने की हिम्मत नहीं कर सकता. यह एक प्रक्रिया का नतीजा है.

अब आप सोच रहे होंगे कैसी प्रक्रिया?

जी बलात्कार करने से पहले वो इंसान अपने किसी नज़दीकी को छेड़ा होगा. उसे उसकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ छुआ होगा और वो जिसके साथ भी यह घटिया हरक़त किया होगा, उसने उसके ख़िलाफ़ किसी भी वजह से आवाज़ नहीं उठा पाई होगी. वहां से उसे और हिम्मत मिला होगा फिर उसने सड़कों पर अनजान लड़कियों को देख कर सीटी बजाया होगा, फब्तियां कसी होंगी. बदले में उन लड़कियों ने भी उसे कुछ नहीं कहा होगा. उस पर कोई क़ानूनी करवाई नहीं हुई होगी.

फिर ऐसे कई घटनाओं को अंजाम देने और बिना किसी के नज़र में आये बच निकलने का नतीज़ा होता है कि उसे लगने लगता है कि अब उसका कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता. वो कुछ भी कर के बच कर निकल सकता है फिर ऐसे में एक दिन मौका पा कर अपने से काफ़ी कमज़ोर, जो उसके ख़िलाफ़ क्या अपने लिए भी आवाज़ नहीं निकाल सकती उसका बलात्कार कर डालता है.

 

Rape

 

इसके अलावा बलात्कार की घटनाओं में इज़ाफ़ा होने का एक अहम् कारण इंटरनेट और व्हाट्स एप्प बनता जा रहा है.

ज़रा सोचिये जिस तरह के GIF और एडल्ट जोक्स हम आपस में मज़े के लिए एक-दूसरे को भेजते हैं उन्हीं में से कुछ जोक्स और GIF इन मनोरोगी तक भी वायरल होते हुए पहुँच जाते होंगे न. हम और आप जैसे लोग पढ़ कर या देख कर भूल जाते हैं मगर वो लोग जिनके लिए, लड़कियां सिर्फ और सिर्फ सेक्स का साधन है. जिन्हें सेक्स के उन्माद के आगे कुछ नहीं दिखता वो जब इन क्लिप्स, MMS और GIF को देखते होंगे तो उनके मन में किस तरह का ख़्याल आता होगा? क्या वो किसी नतीजे के विषय में सोच भी पाते होंगे?

नहीं, वो उस वक़्त कुछ और नहीं सोच पाते हैं. वो बस निकल पड़ते हैं अपनी शिकार की तलाश में. जो सबसे कमजोर और अकेला उन्हें दिखता है वो उसका बलात्कार कर डालते हैं. एक बार अपने अंदर के हवस की आग को बुझा लेते हैं फिर उन्हें पकड़े जाने का ख़्याल सताता है और ऐसे में वो हत्या कर डालते हैं अपने शिकार.

तो स्तिथि में क्या सिर्फ कानून बना देने भर से बलात्कार रुक जायेंगे? क्या डर की वजह से बलात्कारी, बलात्कार नहीं करेंगे?

वो करेंगे. अगर इन बलात्कारों को रोकना है तो कानून के साथ समाज को भी सेन्सेटाइज़ करना होगा. शुरुआत हमें अपने आस-पास से ही करना होगा. हमें खुद को समझने और अपनी बच्चियों को समझाने की जरुरत है कि जब भी कोई उनके साथ कुछ गलत कर रहा है वो आवाज़ उठायें. डर कर या चुप रह कर कुछ नहीं बदलने वाला. ख़ास कर उस स्तिथि में जब कोई करीबी ऐसी ओछी हरक़त करे तो इज़्ज़त और समाज का सोच कर चुप नहीं रहना है बल्कि उसे समाज के सामने लाना है, ताकि भविष्य में ऐसा करने की कभी न सोचे और सबसे अहम बात बलात्कार को इज़्ज़त लूटने से जोड़ा जाना बंद किया जाना चाहिए. जिसने बलात्कार किया इज़्ज़त उसकी गयी है न की पीड़िता की.

वक़्त आ गया है कि कानून के साथ सोच में बदलाव लाया जाये. बलात्कार को इज़्ज़त और आबरू से नहीं बस एक दुर्घटना की तरह देखा जाये और पीड़िता को समाज में ढंग से जीने दिया जाये न कि हर कदम पर उसे याद दिलाया जाये कि उसके साथ जो हुआ है, उसके बाद वो किसी क़ाबिल नहीं बची है.

 

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