मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि मुजफ्फरपुर से आनंद विहार जा रही बस में कोई आदमी नहीं जला। चौंकिए नहीं, पूर्वी चंपारण में कोटवा के पास बस जली, आदमी नहीं जले। जो जले वे आदमी थे ही नहीं। मैं नहीं मानता उनको आदमी। आजादी के जंग और अंग्रेजों के जुर्म की कहानी पढ़िए। अंग्रेज हम लोगों को आदमी समझते ही नहीं थे। जाते वक्त वे भारत में अपनी दो औलादों को छोड़ गए, एक वर्दी वाला और दूसरा टाई-कोट वाला। अंग्रेजों की ये दो औलादें हमें कभी आदमी मानते ही नहीं। क्या इस देश में वर्दी वाले और कोट वाले हमे आदमी समझते हैं? इसलिए आप यकीन मानिए, कोटवा में बस में कोई आदमी नहीं मरा।

दरअसल, हम लोग खुद को आदमी कहने और समझने की थेथरई करते हैं। आप कलेजे पर हाथ रखकर बताइए, क्या इस साल सड़कों पर (खासकर मुजफ्फरपुर में) लगातार जारी हादसों में कोई आदमी की मौत मारा जा रहा है! क्या मुजफ्फरपुर-सीतामढ़ी रोड में धर्मपुर और भनसपट्टी हादसों में जो अबोध बच्चे और बेगुनाह ग्रामीण मारे गए, वे आदमी की मौत मरे? सीतामढ़ी रोड में इन दिनों ग्रामीण सड़क यात्रा से परहेज़ कर रहे हैं। इसकी भनक, सड़क किनारे के गांवों में कुत्तों को भी लगी है। कुत्ते एक-दूसरे को हिदायत देने लगे हैं, सड़क पर मत जाओ बर्ना आदमी की मौत मारे जाओगे। ये तो हद हो गई। हम मरे नहीं और हमारी मौत का हवाला दिया जा रहा है। कुत्तों को कम से कम साहबों की जांच रिपोर्ट का इंतजार करना चाहिए था। मांस की बात छोड़िए, बस में हड्डी तक नहीं बची। फारेंसिक टेस्ट में अगर पाज़िटिव रिपोर्ट आ जाए तो हम मान लेंगे कि आदमी की मौत हुई है।

आप लोग मेरी मूर्खता पर हंस रहे हैं। पहले मेरे सवालों के जवाब दीजिए। इन दिनों दिल्ली जाने वाली बसों में यात्रियों को क्या ‘आदमी’ की तरह ठूंस- ठूंस कर बैठाया जाता है? क्या दिल्ली से बिहार आने-जाने वाली ट्रेनों में हमें आदमी की तरह यात्रा करने का सौभाग्य प्राप्त होता है? क्या हुकूमत हमारे साथ आदमी जैसा सलूक करती है? तो क्या हम आदमी कहलाने के काबिल हैं? क्या शरीर में आंख, नाक या कान की आकृतियां होने मात्र से कोई आदमी कहलाएगा? क्या गूंगी-बहरी आबादी को आदमी कहलाने का हक है? क्या वोट का अधिकार, आरक्षण, प्रमोशन, अंत्योदय- अन्नपूर्णा या इंदिरा आवास मिल जाने से हम आदमी कहलाने के हकदार हो गए। जिस तरह कुत्तों के गले में चमड़े का बेल्ट या सिक्कर डाला जाता है, उसी तरह हमारे गले में अगड़ा-पिछड़ा, दलित-महादलित, बाभन- क्षत्रिय, हिन्दू-मुसलमान की पट्टी टांगी गई है और हम आदमी होने का गुमान पाले बैठे हैं। अपने गले की जातीय चमौटी के लिए हम मर-मिटने को तैयार हैं।

यह ठीक है कि हम जानवर नहीं हैं। हमने काफी तरक्की की है। हम बहू-बेटियों को नंगा कर उनकी इज्जत नोचते वक्त जानवरों को पीछे छोड़ने लगे हैं। ऐसे मुबारक मौकों की वीडियो क्लिपिंग वायरल कर हमने जानवर से भी अलग होने की बढ़त व नैतिकता हासिल कर ली है।

आपने कभी सोचा है कि हमारे आदमी होने की अफवाह कौन फैला रहा है? इस फसाद की जड़ में लोकतंत्र है, जिसे किताबों में जम्हूरियत भी कहते हैं। आप आदमी होते तब तो जम्हूरियत का अर्थ समझते!

‘जम्हूरियत इक तर्ज-ए-हुकूमत है कि जिसमें, बंदों को गिना करते हैं तौला नहीं करते!’ हम अल्लामा इकबाल का ये शेर क्या पढ़ लिए, आदमी होने का दंभ भरने लगे।अब तो लोकतंत्र के नाम पर हमें तौला भी जा रहा है और गिना भी जा रहा है। लोकतंत्र में बंदों के लिए दिल्ली दूर है। लोकतंत्र की जन्मस्थली से वैशाली एक्सप्रेस को दिल्ली पहुंचने में 20-22 घंटे लग रहे हैं और गंगा पार से राजधानी एक्सप्रेस महज12 घंटे में दिल्ली पहुंच जाती है।सच तो यह है कि हम उत्तर बिहार वाले ट्रेन पर सफर के हकदार हैं ही नहीं। हम तो जानवरों की तरह (गदहे-कुत्ते व भेड़-बकरियां हमें क्षमा करें, क्योंकि इस आलेख का किसी जानवर से कोई संबंध नहीं है। मेरा उद्देश्य किसी जानवर का उपहास या मजाक उड़ाना नहीं है।) बस में लदकर दिल्ली जाने के हकदार हैं। इस मर्म को हमारे माननीय समझने लगे हैं। वे मुजफ्फरपुर आकर दिल्ली जाने वाली बसों को हरी झंडी दिखाने लगे हैं। बसों को दिल्ली जाने-आने का परमिट हो न हो, यात्रियों को सीधे ऊपर पहुंचने का परमिट मिल रहा है।

गलती हमारी नहीं है। सारी गलती मीडिया वालों की है। मीडिया हमारे आदमी होने का भ्रम पालती है। मीडिया नथुनी भगत स्कूल की करोड़ों रुपए की जमीन पर अवैध कब्जे की खबरें छापकर हमें उकसाने की कोशिश करती है। जब हम आदमी हैं ही नहीं तो मीडिया की किसी रिपोर्ट पर नथुनी भगत स्कूल की जमीन को बचाने के लिए आवाज उठाने की गलती क्यों करेंगे?

मीडिया खाकी वाले के घर से रुपए-, हथियार बरामद होने की खबरें छापकर हमें उकसाती है। अभी-अभी मुजफ्फरपुर से ट्रांसफर होकर गए टाइ वाले के पास बेशुमार काली कमाई की अफवाह फैलाती है। बस में आदमी के जिंदा जलने की अफवाह फैलाती है। लेकिन हम मीडिया वालों के बहकावे में आकर आवाज नहीं उठाएंगे। क्योंकि हमारा जमीर मर चुका है। हम आदमी हैं ही नहीं।

जो चले गए वे सफर के काबिल नहीं थे। दिल्ली पहुंचने के हकदार नहीं थे। बेचारी बस!भला ऐसे ऐरे-गैरे को दिल्ली तक पहुंचने क्यों देती?न हो कमीज तो घुटनों से पेट ढक लेंगे, ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफर के लिये?

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