बिहार के सर गंगानाथ झा को बनाया गया था BHU का पहला कुलपति, पिता के बाद बेटा बना विवि का अगला VC

स्वतंत्र भारत में बिहार का मिथिला क्षेत्र विद्वानों की धरती रही है। यहीं कारण है कि यहां एक से एक विद्वानों ने जन्म लिया। मां सीता की जन्मभुमि होने के कारण कुछ लोग इस देवताओं की नगर भी कहते हैं। वैसे तो यहां कई महा पुरुषों ने जन्म लिया है, लेकिन लाइव बिहार आज आपके सामने ऐसे दो महान लोगों की कहानी लेकर आया है जिसे देश भर में नहीं बल्कि उनकी विद्वानता के कारण विदेशों में जाना जाता है।

यह कहानी एक पिता और पुत्र की है। संभवत: यह देश भर में अकेला संयोग है कि जिस पद से पिता रिटायर हुए आगे चल कर होनहार बेटे ने उसी कुर्सी को संभाला। हम बात कर रहे हैं बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के पहले कुलपति डॉ सर गंगा नाथ झा और उनके पुत्र डॉ अमरनाथ झा की। आइए जानते हैं वरिष्ठ पत्रकार पुष्य मित्र की जुबानी एक अनोखी कहानी..

यह महामहोपाध्याय सर गंगानाथ झा के भाई का मकान है। कल मैं यहीं था। मधुबनी जिले के सरिसब पाहि गांव में जो गंगानाथ झा और उनके पुत्र अमरनाथ झा का पैत्रिक गांव है। गंगानाथ झा का पैत्रिक मकान बिल्कुल पड़ोस में है, जहाँ कुछ व्यस्तताओं की वजह से मैं जा न सका।

बिहार के लोग सर गंगानाथ झा और अमरनाथ झा यानी पिता-पुत्र की ख्यातिनाम जोड़ी से शायद अपरिचित हों मगर इलाहबाद में एक जमाने में दोनों का काफी अदब था। संस्कृत, उर्दू और अंग्रेजी में समान अधिकार रखने वाले सर गंगानाथ झा को न्याय शास्त्र का बड़ा विद्वान माना जाता है। उनकी लिखी और अनूदित पुस्तकें पाश्चात्य विद्वानों के लिए भारत को समझने का आधार बनी। वे इलाहाबाद विवि के पहले कुलपति थे और तीन टर्म तक लगातार कुलपति चयनित होते रहे और जब उन्होंने कुलपति पद छोड़ा तो आगे चलकर यह पद उनके पुत्र अमरनाथ झा को सौंपा गया। यह भी सम्भवतः इतिहास की इकलौती मिसाल होगी।

अमरनाथ झा की ख्याति भी एक बेहतरीन शिक्षाशास्त्री के रूप में रही है। वे इलाहबाद विवि के बाद बनारस विवि के भी कुलपति बने। नेशनल डिफेन्स एकेडमी की स्थापना समिति के उपाध्यक्ष थे, यूपीपीएससी के संस्थापक अध्यक्ष बने फिर bpsc के चेयरमैन के रूप में भी अपनी सेवाएँ दीं।

प्रयाग में दोनों पिता-पुत्रों का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है। वहां सर गंगानाथ झा के नाम से एक शोध संसथान भी है। पिछले दिनों अमिताभ बच्चन ने अमरनाथ झा को याद करते हुए एक ब्लॉग पोस्ट लिखा था जिसमें उन्होंने जिक्र किया था कि कैसे अमरनाथ झा ने उनके पिता हरिवंशराय बच्चन को नीलम पत्थर गिफ्ट किया था जिन्हें वे ताउम्र पहनते रहे और 90 के दशक में खुद अमिताभ ने भी नीलम पहनना शुरू कर दिया था। उस पोस्ट में उन्होंने नीलम पत्थर के असर का तो जिक्र किया ही था, फिल्म निर्देशक प्रकाश झा के अमरनाथ झा से रिश्ते का भी जिक्र किया था।

बहरहाल बच्चन परिवार पर अमरनाथ झा के कई उपकार हैं जिनका जिक्र हरिवंश राय बच्चन ने अपनी आत्मकथा में किया था। अमरनाथ झा ने ही उन्हें डॉक्टरेट करने के लिए कैम्ब्रिज भेजा। तेजी से उनका परिचय और विवाह कराया। यह वो वक़्त था जब हरिवंश राय बच्चन की पहली पत्नी श्यामा गुजर चुकी थी और वे कई कारणों से परेशान रहते थे। कहते हैं, अमरनाथ झा के संपर्क में आने के बाद उनकी कई परेशानियों का अंत हो गया।

एक किस्सा यह भी है कि अमरनाथ झा अमिताभ का नाम इन्कलाब राय रखना चाहते थे मगर तेजी को यह नाम पसंद नहीं आया। फिर सुमित्रानंदन पन्त ने अमिताभ का नाम प्रस्तावित किया जो स्वीकृत हो गया। यह लिखते हुए यह बात भी याद आ गयी कि फनीश्वरनाथ रेणु ने अपने उपन्यास मैला आंचल का नाम भी सुमित्रानंदन पन्त की कविता से लिया है। बहरहाल अमरनाथ झा और अमिताभ को लेकर कुछ दूसरे किस्म की अफवाहें भी चर्चा में रही हैं। मगर न तो उनकी पुष्टि हो सकती है न ही उनका उल्लेख उचित है।

फ़िलहाल मैं सरिसब पाहि गांव से दूर निकल आया हूँ। वह गांव जहाँ इस पिता-पुत्र की विलक्षण जोड़ी ने जन्म लिया था हालाँकि इस गांव की असली पहचान एक पौराणिक विद्वान अयाची मिश्र से है जो कभी किसी के पास याचना करने नहीं गये।

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