भय, भूख, भ्रष्टाचार…इन्हें मिटाने के वादे, इससे जुड़े नारे हर चुनाव में सुनाई देते रहे हैं। इस चुनाव में ‘भय’ की बातें हो रहीं। ‘भ्रष्टाचार’ पर प्रहार के दावे हो रहे। मंच से लेकर पार्टियों के मेनिफेस्टो तक में इनका जिक्र है। ‘जंगलराज’ व ‘जेल’ का इस्तेमाल ताकत से हो रहा। नहीं हो रही है तो ‘भूख’ पर बात।

चुनाव में छठ तक पांच किलो मुफ्त राशन और जन-धन खाते में 500 रुपए देने तक ही फिलहाल भूख सिमटी हुई है। वर्ल्ड हंगर इंडेक्स की 2020 की रिपोर्ट पर विशेषज्ञों की राय है कि देश की रैंकिंग जिन बड़े राज्यों की वजह से नहीं सुधर रही उनमें बिहार भी है। चुनाव में पाक, जिन्ना की खूब बातें हो रही हैं। लेकिन, वर्ल्ड हंगर इंडेक्स की रिपोर्ट बताती है कि भारत 94वें, पाक 88वें, बांग्लादेश 75 वें, नेपाल 73 वें स्थान पर हैं।

लॉकडाउन: गूंजा था राशन का संकट
लॉकडाउन के बाद राज्य में भूख का मसला खूब उछला। तब देश में 39 लाख परिवारों को खाद्य सुरक्षा कानून के तहत राशन नहीं मिल रहा था, इसमें 14 लाख परिवार बिहार के ही थे। इसको लेकर केंद्र व राज्य में खूब पत्राचार हुआ। बाद में कार्ड बना, राशन मिलना शुरू हुआ। नई दिल्ली स्थित अंतरराष्ट्रीय फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट की सीनियर फेलो पूर्णिमा मेनन के मुताबिक हंगर इंडेक्स में भारत की स्थिति तब तक नहीं सुधरेगी जब तक यूपी, बिहार और एमपी की हालत नहीं सुधरती।

दो अंकों की विकास दर फिर भी गरीबी नहीं घटी… यानी इनकम ट्रांसफर नहीं हो रहा
भूख…जीवन से जुड़ा बुनियादी सवाल है और यही हल नहीं हुआ तो विकास की हर बात बेमानी है। राज्य की विकास दर दो अंकों में है लेकिन यदि गरीबी नहीं घट रही तो जाहिर है लोगों तक जिस अनुपात में इनकम ट्रांसफर होनी चाहिए, वह नहीं हो रही। चंद लोगों की ही कमाई बढ़ रही है।

यह नीतियों, प्राथमिकताओं में खामी दर्शाती है। बेरोजगारी और गरीबी का भी सीधा वास्ता भूख से ही। कोरोनाकाल में हमारे श्रमिक घर लौटे लेकिन टिके नहीं, खतरे के बीच काम की तलाश में दूसरे राज्य निकल गए। इसके पीछे सिर्फ एक वजह है और वह भूख है। कुपोषण के कारण पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मौत के मामले में बिहार देश के पिछड़े राज्यों में एक है।