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बिहार की बेटी को मिला नगालैंड 10वीं बोर्ड परीक्षा में 11वां स्‍थान, बनना चाहती है IAS

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बिहार की बेटी ने एक बार फिर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है। अपने राज्‍य, जिले व गांव का नाम रौशन किया है। पूर्वी चंपारण जिले के नक्सल प्रभावित पकड़ीदयाल प्रखंड के चैता गांव की बेटी निशा ने नागालैंड बोर्ड आॅफ स्कूल, कोहिमा द्वारा आयोजित 10 वीं बोर्ड परीक्षा में 11 वां स्‍थान प्राप्‍त किया है। तीन नंबर से उसका सर्वोच्च स्थान छूट गया है।

चैता गांव निवासी स्व. अमर सिंह और बबिता देवी की पुत्री निशा की इस सफलता से जिले के लोग गदगद हैं। निशा की मां अकेले गांव में छोटी बेटी के साथ रहती हैं। वह भले ही कम पढ़ी-लिखी महिला हैं, लेकिन आज उनकी बेटी ने मां का सर गर्व से ऊंचा कर दिया है।

भारतीय प्रशासनिक सेवा जाना चाहती है निशा 

चैता की बेटी निशा इस सफलता को अपनी मंजिल की पहली सीढ़ी मानती हैं। निशा भारतीय प्रशासनिक सेवा में जाना चाहती हैं। कहती है कि समाज के दबे-कूचले लोगों की आवाज बनकर सेवा करना चाहती हूं। सफलता प्राप्त करने का निश्चय है और उसे प्राप्त करके ही दम लूंगी।

सफलता का श्रेय दिया चाचा-चाची को

2006 में निशा के पिता अमर सिंह की मृत्यु हो गई। फिर पेशे से शिक्षक चाचा प्रेमशंकर सिंह व चाची अनिता देवी ने उसे व उसकी बहन को अपने साथ नागालैंड के डीमापुर में रखा। चाची ने मां की भूमिका का निर्वहन बखूबी किया। निशा ने अपनी सफलता का श्रेय चाचा-चाची और गुरुजनों को दिया। कहा कि चाची मेरी मां की तरह हैं।

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तीन बहनों में सबसे बड़ी है निशा

निशा तीन बहनों में सबसे बड़ी हैं। उनसे छोटी बहन काजोल भी चाचा-चाची के साथ रहती हैं। वह 9 वीं कक्षा में पढ़ती है। जबकि छोटी बहन आरती मां के साथ चैता गांव में रहती है।

चाची ने पिता की मौत के बाद संभाला परिवार को

निशा की सफलता के बाद उनके गांव में जश्न का माहौल है। इनके दरवाजे पर आने के साथ 2006 की घटना ताजा हो जाती है। परिवार के लोगों के मुताबिक 2006 में जब निशा के पिता अमर की मौत हुई तो परिवार अचानक बिखर गया। लेकिन, चाची अनिता व दीमापुर हायर सेकेंडरी स्कूल में प्राचार्य के पद पर कार्यरत चाचा प्रेमशंकर सिंह गांव आए और दो बहनों को लेकर दीमापुर आए। फिर बेटी ने अपनी मेहनत की बदौलत मुकाम हासिल किया।

त्याग की मिशाल हैं अनिता

निशा अपनी चाची को त्याग की मिशाल बताती हैं। कहती हैं कि दीमापुर आने के बाद चाची ने 2 बच्चों को जन्म दिया। लेकिन, कोई जीवित नहीं बचा। फिर दृढ़ इच्छाशक्ति के बूते परिवार नियोजन कराते हुए हम दोनों बहनों को अपना लिया। मां के प्यार के साथ-साथ उचित शिक्षा देकर आज इस मुकाम पर पहुंचाया है। अनिता के इस त्याग को पूर्वी चंपारण के लोग मिशाल के तौर पर ले रहे हैं।

Input : Dainik Jagran

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