राज्य के लीची पैदावार वाले जिलों में प्रतिवेदित मस्तिष्क ज्वर का खतरा अन्य जिलों से अलग है। इस बीमारी से पीडि़त मरीजों में जो लक्षण पाए जाते हैं करीब-करीब वही लक्षण लीची उत्पादन वाले जिलों में भी प्रतिवेदित मरीजों में पाया गया है। ऐसे मरीजों का समय पर इलाज आवश्यक है, अन्यथा पीडि़त की जान भी जा सकती है।

इससे बचाव एवं विशेष जानकारी के लिए राज्य स्वास्थ्य समिति ने लीची पैदावार वाले जिलों के लिए मस्तिष्क ज्वर मार्गदर्शिका भी जनहित में जारी की है। हालांकि भागलपुर जिले के नवगछिया अनुमंडल में बड़े पैमाने पर लीची का उत्पादन होता है, लेकिन यहां मस्तिष्क ज्वर की शिकायत अभी नहीं मिली है।

बीमारी में लीची की भूमिका

शोध में पाया गया है कि लीची के बीज, पके एवं अधपके लीची के फल में एक ऐसा हानिकारक रसायन पाया जाता है जो खून में शुगर के स्तर को एकाएक इतना कम कर देता है कि मरीज की स्थिति गंभीर हो जाती है। हालांकि पूरी तरह पके हुए लीची के फल में वह हानिकारक रसायन का असर कम हो जाता है।

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बीमारी के लक्षण

सिरदर्द, तेज बुखार, अर्ध चेतना, पहचानने की क्षमता कम हो जाना, बच्चे का बेहोश हो जाना, शरीर में चमकी, हाथ-पैर में थरथराहट, हाथ पैर अकड़ जाना, लकवा की आशंका आदि इसके लक्षण हैं।

कब होती है यह बीमारी

अमूमन यह बीमारी लीची उत्पादन के समय होता है। यूं कहें कि अप्रैल माह के अंत से जून माह के अंत तक यह बीमारी फैलने की आशंका ज्यादा रहती है। इसका कारण यह है कि लोग कच्ची-पक्की लीची का सेवन ज्याद करते हैं। हालांकि बारिश शुरू होते ही इस बीमारी का खतरा धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है।

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इन्हें बीमारी होने की ज्यादा रहती है संभावना

जो परिवार लीची के बगानों के आसपास रहता है या ऐसा व्यक्ति जो जरूरत से ज्यादा लीची का सेवन करता है। या फिर वैसे एक से 15 वर्ष के कुपोषित बच्चे जो अधपके या पके लीची का सेवन प्राय: करते हैं। या फिर लीची खाकर ही बिना खाना खाए रात में सो जाने के कारण ऐसे लोगों के मस्तिष्क ज्वर से पीडि़त होने का खतरा अधिक होता है।

बचाव का यूं करें उपाय

अगर मस्तिष्क ज्वर बीमारी की पहचान हो जाय तो तेज बुखार की स्थिति में ताजा पानी से पीडि़त के बदन को कपड़ा भीगाकर पोछना चाहिए। पंखे से हवा भी करना चाहिए ताकि बुखार कम हो सके। साफ पानी में ओआरएस का घोल बनाकर पिलाएं। मरीज को हवादार स्थान पर रखें। यह अत्यधिक नमी और गर्मी के कारण होने वाली बीमारी है। घबराए नहीं, तत्काल चिकित्सक से संपर्क करें।

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क्या बरतें सावधानी

इस रोग से बचाव के लिए बच्चों को लीची बगान में न जाने देना चाहिए। अधपका एवं कच्चे लीची का फल  सेवन से परहेज करें। अगर बच्चे ने दिन में लीची का सेवन किया है तो रात्रि में उसे खाना अवश्य खिलाएं।

लीची का सेवन वर्जित नहीं

प्रकृति के इस अनुपम उपहार का सेवन वर्जित नहीं है। लेकिन रात में सिर्फ लीची का सेवन कर बच्चों को न सोने दें। उन्हें भरपेट खाना खिलाएं। पकी हुई लीची ही खाने दें। अधपकी और कच्ची लीची नहीं खाने दें। इतना ही नहीं ज्यादा लीची का सेवन करने से बचें।

पकी हुई लीची स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है। लेकिन राज्य स्वास्थ्य समिति द्वारा जनहित में जारी मार्गदर्शिका का पालन अवश्य करना चाहिए।

– डॉ. विशाल नाथ, निदेशक, राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र मुजफ्फरपुर 

Input : Dainik Jagran

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