हम उस देश के वासी हैं जहाँ शौचालय से ज़्यादा लोग मोबाईल फ़ोन इस्तेमाल करते हैं.

साथ में समस्याएं हमें तब ही नज़र आती है जब उस पर कोई फ़िल्म बनें और ख़त्म भी फिल्म की रिलीज़ के साथ ही हो जाती है. मगर जमीनी हक़ीक़त कुछ और है. पिछले दिनों जब अक्षय कुमार की फ़िल्म ‘टॉयलेट एक-प्रेम कथा’ आयी थी तो सब को शौचलय की समस्या दिखने लगी थी. सोशल मिडिया से ले कर हर जगह शौचालय बनें और लोग जागरूक हो इस पर चर्चाओं का दौर शुरू हो गया था. सच में लगा था कि इस फ़िल्म को देख कर बड़ी क्रांति आएगी.

काश कि फिल्मों के द्वारा क्रांति लायी जा सकती

जी आज मैं बात कर रही हूँ शौचालयों की. ख़ास कर बिहार और मुज़फ़्फ़रपुर की. बिहार की जितनी आबादी है उसमें से 69.3 प्रतिशत आबादी अब भी खुले में शौच करने को बेबस है. गांवो के बारे में बाद में बात करते हैं पहले शहर की बात करते हैं. मुज़फ़्फ़रपुर की धड़कन है मोतीझील. जहाँ लगभग हर दिन हज़ारों लोग शॉपिंग करने या किसी न किसी जरुरी काम से जाते हैं लेकिन यहाँ भी शौचालयों की सुविधा ने के बराबर है.

पुरुषों के लिए तो ये समस्या कभी से रही ही नहीं है मगर औरतों-लड़कियों के लिए ये परेशानी का सबब है. कुछ औरतों से हमने बात किया इस मुद्दें पर. वो कहती हैं, “हम घर से कम पानी पी कर निकलते हैं ताकि हमें पेशाब करने न जाना पड़े.” तो वही कालेज की छात्रा कहती हैं, “ऐसे तो आप समय काट भी लेते हैं मगर जिन दिनों में पीरियड आया रहता है, उन दिनों में हम घर से बाहर नहीं निकलते क्यूंकि जो एकाध शौचालय है वो इतने गंदे हैं या उनके दरवाज़े बंद नहीं हो पाते कि आप उनका इस्तेमाल कर सकें.”

पूछे जाने पर ऐसी अनगिनत परेशानियों का ज़िक्र करती हैं ये महिलाएं. एक महिला बताती हैं कि उनका फिल्ड जॉब है, ऐसे में अगर उन्हें शौचालय की आवश्यता महसूस होती है तो वो किसी दुकान में जा कर कुछ ख़रीद कर, फिर ही उसका प्राइवेट टॉयलेट इस्तेमाल कर पाती हैं.”

अब आप ही सोचिये क्या ये सम्भव है कि हर बार कुछ न कुछ ख़रीद पाना. ये ऐसे मुद्दें हैं जो चुनावों में उठने चाहिए. चाहे चुनाव शहर के विधायक या उसके महापौर का लेकिन चुनाव किसी भी स्तर का हो सिर्फ जाति और धर्म देख कर वोट कर आते हैं. फिर झेलते रहते हैं इन समस्याओं को.

ख़ैर ये तो हुई शहर की बात. अब ज़रा रुख गांव का करते हैं. गाँव में अब भी औरतें सूरज के निकलने से पहले नदी या तालाब के किनारे जाती दिख जाएँगी आपको. वही शाम ढले सड़कों और बांधों के किनारे. जहाँ देश में नारी-सशक्तिकरण के लिए इतने नारे लग रहे हैं वही इन गांव की गरीब औरतों के लिए क्या हो रहा है, ये आप इन गांवों में जा कर देख सकते हैं. ये अब भी खेतों में शौच के लिए जाती हैं. वहाँ से लेकर आती हैं कई संक्रामक बीमारियां. इतना ही नहीं शौच जाने के दौरान इनको सामना करना पड़ता है उन लफंगों का जो इसी ताक में बैठे रहते हैं कि कब वो निकलेंगी और उनको छेड़ेंगे.

वैसे ये घटनाएं इतनी आम हैं इन औरतों के लिए कि वो इसका शिकायत तक नहीं कर पाती. शिकायत करके भी क्या कर लेंगी? उनकी समस्या शिकायत कर देने से हल तो नहीं हो जाएगी और ऊपर से गांव में तो यही सोच है कि, औरत के साथ कुछ गलत हुआ इसकी ज़िम्मेदार वही है. पति से लेकर घर के दूसरे मर्द भी उसी को चुप रहने की सलाह देते हैं.

तो ऐसे में ‘देश में मंदिर बाद में बनें, पहले शौचालय बनाया जाये’ का नारा ख़ोखला ही साबित होता नज़र आ रहा है. बाकि तो चल ही रहा है और चलता ही रहेगा. चुनाव आने वाले हैं तो वोट देने से पहले अपने नेताओं से ज़रा इन मुद्दों पर भी सवाल कर लीजियेगा.

 

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