पटना: बिहार में बैंकों के कर्ज देने की रफ्तार 35.17 फीसद से घटकर 33.39 फीसद हो गई है. राज्य के बैंकों का जमा ऋण अनुपात भी 43.11 फीसद है, जो बेहतर नहीं कहा जा सकता. राज्य के कुल 30 में 18 बैंक कर्ज देने के मामले में औसत से भी पीछे हैं. इनका सीडी रेशियो राज्य के औसत सीडी रेशियो से भी कम है. सोमवार को राज्यस्तरीय बैंकर्स कमेटी की बैठक में ये आंकड़े सामने आए. जिसके बाद उपमुख्यमंत्री सह वित्त मंत्री तारकिशोर प्रसाद ने इसे निराशाजनक बताते हुए बैंकों को अधिक से अधिक कर्ज देने का निर्देश दिया.

कोरोना काल और चुनाव की वजह से बैंक लक्ष्य प्राप्त करने में रहे असफल
तारकिशोर प्रसाद ने कहा कि कोरोना संक्रमण और बिहार विधानसभा चुनाव के कारण बैंक अपने लक्ष्य की प्राप्ति नहीं कर सकें. उन्होंने बताया कि बैंकों के स्तर से क्रियान्वित की जा रही योजनाओं में लक्ष्य के अनुरूप अपेक्षाकृत प्रगति नहीं हो पाई है. एसीपी में 34% और साख-जमा अनुपात 43% की उपलब्धि ही अब तक हासिल हो सकी है. लगभग 18 ऐसे बैंक हैं, जिनका परफॉर्मेंस औसत से भी कम पाया गया है. तकरीबन 10 जिले ऐसे हैं, जहां राज्य के औसत से भी कम प्रगति हुई है. उन्होंने बैंकों के प्रतिनिधियों को निर्देश देते हुए कहा कि इस वित्तीय वर्ष 2020-21 के शेष महीनों में लक्ष्य के अनुरूप अपेक्षित प्रगति लाने की दिशा में ठोस कार्रवाई सुनिश्चित की जाए.

पिछड़ने वाले 18 बैंकों और 30 जिलों की अलग से बैठक करें
उपमुख्यमंत्री तारकिशोर ने वित्त विभाग के प्रधान सचिव को निर्देश दिया कि कर्ज देने में पिछड़ने वाले 18 बैंकों और 30 जिलों की अलग से बैठक करें. एसएलबीसी की बैठक का वार्षिक कैलेंडर जारी करें. प्रखंड स्तर तक बैठक की तारीख तय हो. इसके साथ ही मंत्री ने एसएलबीसी की अगली बैठक से सभी जिलों के डीएम को भी जोड़ने का निर्देश दिया. एससी-एसटी और अल्पसंख्यकों को कर्ज देने में आ रही परेशानी को लेकर अलग से बैठक करने को कहा गया.

बैंक वाले मछली खाने के बाद भी लोन नहीं देते- मुकेश सहनी
पशु और मत्स्य विभाग के मंत्री मुकेश सहनी ने बैंकर्स मीट में खुले आम कहा कि मछुआरे एक लाख का लोन लेने के लिए दस हज़ार की मछली खिला देते हैं फिर भी लोन नहीं मिलता. हालांकि बैठक की बात को कैमरे पर कहने से इंकार कर दिया. लेकिन आरजेडी नेता मृतुन्जय तिवारी ने कहा कि जब सरकार में बैठे लोग उपमुख्यमंत्री और मंत्री को बैंक लोन नहीं दे रहा, तो आम लोगों का क्या होगा? गरीबों मजदूरों और किसानों का इससे सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि जो अपेक्षा होती है किसानों और व्यपारी वर्ग का उनको बैंक सहायता नहीं कर रही है. ये सरकार की नाकामी है, सरकार जिस तरह बैंकों के निजीकरण को लेकर आगे बढ़ रही है, इसमें बैंककर्मी भी सरकार से नाराज हैं और जब बिहार सरकार के माननीय उप मुख्यमंत्री ही अपनी दुखड़ा रो रहे हैं और कह रहे हैं कि बैंक लोन नहीं दे रहे हैं. सरकार के मंत्री ही कह रहे हैं कि मछली खिलाने के बाद भी लोन नहीं मिल रहा है तो इससे सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि बिहार में बैंकों का रवैया क्या है और क्यों है? इसके लिए मौजूदा सरकार दोषी है और यही जिम्मेदार है.

बता दें कि बिहार में नई सरकार के गठन के बाद पहली बार स्टेट लेवल बैंकर्स कमेटी की बैठक की गई. जो कि पटना के अधिवेशन भवन में राज्य स्तरीय बैंकर्स कमिटी की बैठक का आयोजन किया गया.इस बैठक में स्टेट लेवल बैंकर्स के प्रतिनिधि और बिहार सरकार में मंत्री मुकेश सहनी समेत महत्वपूर्ण विभागों के पदाधिकारी और वित्त विभाग के आला अधिकारी शामिल हुए.

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