‘हे पथिक रुको क्षण एक यहां, इस मिट्टी को कर लो प्रणाम, उनको प्रणाम जो नौजवान हंसते हंसते बलिदान हुए। सरैयागंज टावर पर अंकित इस इबारत को सुनने वाला अब कोई नहीं। जी हां, शहीद स्मारक के रूप में स्थापित सरैयागंज टावर अपनी पहचान खोता जा रहा है। टावर पर अंकित उत्तर बिहार के सौ शहीदों के नाम शिलापट से मिट जा रहे हैं। आधा से अधिक नाम जमीन में दफन हो चुके हैं। मथुरा मंडल, सुखदेव राउत, हरिहर प्रसाद, रामयाद तिवारी, मौजे झा, रामफल मंडल, बलदेव महतो, अनिरुद्ध सिंह, मथुरा ठाकुर, खेलावन दास, केश्वर साही, सहदेव साह, मोहम्मद हसीन, मो. युसूफ, सकल राय, सुकन ठाकुर, छकौती लाल, बैकुंठ शुक्ला, योद्धा सिंह जैसे माटी के लाल की अंतिम निशानी को बचाने में शहर और प्रशासन नाकाम हो रहा है। वर्ष 1952 में शहीदों की स्मृति को सुरक्षित रखने के लिए इस टावर की स्थापना की गई थी। इस पर मुजफ्फरपुर समेत सीतामढ़ी, शिवहर, मोतिहारी, वैशाली, बेतिया के शहीदों के नाम अंकित किए गए थे।

सरैयागंज नाका चौक पर इस ऐतिहासिक शहीद स्तंभ का निर्माण स्वतंत्रता सेनानी सह नगरपालिका के तत्कालीन उप चेयरमैन प्रहलाद प्रसाद मेहरोत्रा एवं मोहन लाल गुप्ता के अथक प्रयास से हुआ था। शहीद स्तंभ का उद्घाटन स्वयं देश के प्रथम राष्ट्रपति देशरत्न डॉ.राजेंद्र प्रसाद ने किया था। लगभग चालीस फीट ऊंचे इस स्तंभ पर जयपुर में निर्मित महात्मा गांधी की प्रतिमा स्थापित की गई थी। लेकिन प्रशासनिक उपेक्षा से शहीद स्तंभ महज ट्राफिक पोस्ट बनकर रह गया है।

Input : Dainik Jagran