उन्नाव रेप केस और आसिफ़ा से सम्बंधित खबरें पढ़-पढ़ कर मन बोझिल होता जा रहा है। हम उस देश में रहते हैं जहाँ भारत को भी ‘माता’ कहा जाता है, लेकिन वास्तविकता देखिये! फूलों को खिलने से पहले ही मसल कर फेंक दिया जा रहा, फिर कैसे कल्पना कर सकते हैं हम एक खूबसूरत बगीचे की!

जहाँ एक ओर हम खुद को ‘मॉडर्न’ बनाने की दौड़ में शामिल हैं, वहीं दूसरी ओर इस तरह की दुर्घटनाएं हमें एक अदृश्य जंजीर में बाँधी हुई हैं। हम खुद को कितना भी ‘पॉलिश’ कर लें, रहना तो इसी समाज में है। माहौल ऐसा होता जा रहा है कि हम हर व्यक्ति को सशंकित निगाहों से देखने को मजबूर हैं। समझ नहीं आता कि हमारे आस-पास कौन किस रूप में हमारा शोषण करने को तैयार खड़ा है।

यह दुर्दशा सिर्फ़ महिलाओं या लड़कियों की ही नहीं बल्कि बच्चों की भी है। एक माँ के दिल का हाल तब पूछिये जब बच्चे को स्कूल कैब का ड्राइवर गोदी उठाता है या कोई रिश्तेदार पुचकार कर उसके गाल खींचता है या कोई पड़ोसी ज़्यादा प्यार देने का प्रयास करता है। मानती हूँ कि हर बार सामने वाला गलत नहीं होता लेकिन यह भी सच है कि अधिकांश बार चीज़ें यहीं से शुरू होती हैं। इन्ही परिस्थितियों ने हमें अपने ‘करीबी’ दोस्तों और रिश्तेदारों पर भी भरोसा करने से रोका है।

ऐसी विकृत मानसिकता वाले लोगों के कारण महिलाओं, लड़कियों और बच्चों का व्यक्तिगत जीवन कितना जटिल होता जा रहा है, इस बात का अंदेशा लगाना भी आपकी समझ से परे है। उस मानसिक घुटन को सिर्फ़ कोई पीड़ित व्यक्ति ही समझ सकता है। बातें सिर्फ़ ट्रेन, बस, सड़क और ऑफ़िस जैसी जगहों तक ही सीमित नहीं, ऐसे लोगों का दायरा काफ़ी विस्तृत होता है। आजकल सोशल नेटवर्क के ज़रिये भी ये अपने काम को बखूबी अंजाम दे रहे हैं।

(शेष अगली बार)

– शाल्वी

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