शिक्षा के मंदिर में कानून की धज्जियां उड़ रही हैं। कई निजी स्कूल संचालक परिवहन नियमों की अनदेखी कर रहे हैं। इनका रसूख व पहुंच सुरक्षा कवच है। इन पर लगाम कसने में अधिकारी बेबस हैं। नतीजतन निजी स्कूल बसों में बच्चों की जान पर हमेशा खतरा मंडराता रहता है। क्षेत्रीय परिवहन प्राधिकार द्वारा पांच वर्ष से अधिक पुरानी बसों के परिचालन पर रोक है। कई निजी स्कूलों के पास बसों की संख्या काफी कम है। ऐसे में वे निजी बस संचालकों से बस भाड़े पर ले रहे हैं। कई बस संचालक काफी पुरानी बसों को स्कूल में देकर मलाई काट रहे हैं। बसों की कमी से उसमें क्षमता से कई गुना अधिक बच्चों को ढोया जा रहा है। 40 सीट क्षमता वाली बसों में 100 से अधिक बच्चे सफर करते हैं।

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सुप्रीम कोर्ट के आदेश को ठेंगा : कुछ निजी स्कूल संचालक सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन का खुला उल्लंघन कर रहे हैं। उन्हें रोकने-टोकने वाला कोई नहीं है। इससे उनका हौसला बढ़ा है।

सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन

स्कूल की बस पीले रंग की हो और उस पर ब्लू रंग की स्टिप हो।

स्टिप पर स्कूल का नाम और टेलीफोन नंबर लिखा हो।

बस के आगे और पीछे ‘स्कूल बस’ लिखा हो।

ट्रांसपोर्ट एजेंसी से हायर हो तो बस पर स्पष्ट रूप से, आन स्कूल ड्यूटी’ लिखा हो।

अनिवार्य रूप से फस्र्ट एड बाक्स होना चाहिए।

खिड़कियों में सही तरीके से ग्रिल लगी हो।

फायर एस्टिंग्यूसर की सुविधा हो।

दरवाजे आसानी से खुलने-बंद होनेवाले व ताला लगा हो।

बैग रखने के लिए सीट के नीचे पर्याप्त स्थान हो।

क्या है स्थिति

अनट्रेंड हैं अधिकतर चालक

गाइडलाइन से अनभिज्ञ हैं अधिकतर स्कूल बसों के ड्राइवर।

बीच सड़क पर ही खड़ी कर देते हैं बस

अटेंडेंट नहीं होने से सड़क पार करने में बच्चों को होती है परेशानी

फस्र्ट एड की जानकारी नहीं है चालकों को

एजेंसी वाली बसों में नहीं दिखता फस्र्ट एड बॉक्स।

खड़े होकर बच्चों को करनी पड़ती है यात्र।

अटेंडेंट अनिवार्य रूप से हो।

स्कूल टीचर साथ में सफर करें।

 

 

स्कूल बसों में पांच वर्ष से पुरानी को परमिट नहीं दिया जा रहा है। बच्चों की सुरक्षा से खिलवाड़ करनेवाले स्कूल संचालकों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। -कुमार विजेंद्र प्रसाद, आरटीए सचिव

स्कूलों में जो बस दी जाती हैं वे पूरी तरह फिट होती हैं। बच्चों की सुरक्षा का पूरा ख्याल रखा जाता है। – मुकेश शर्मा, जिलाध्यक्ष मोटर्स ट्रांसपोर्ट फेडरेशन

 

ओवरलोड चलने से बच्चों की जान पर भी खतरा

 

कई निजी स्कूल संचालक परिवहन नियमों की कर रहे हैं अनदेखी

 

Input : Dainik Jagran

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