“सच ही तो कहते हैं माँ-पापा, उनके अलावा सिर्फ़ मुकेश चाचा ही हैं जो मुझे इतना प्यार करते हैं। जब भी हमारे घर आते हैं, मेरे लिये चॉकलेट और चिप्स लेकर आते हैं। मुझे अपनी गोद में बिठाकर अपने हाथों से खिलाते हैं और अगर ज़रा सी भी चॉकलेट मेरे मुँह पर लगी रह जाये तो उसे अपने रुमाल से पोंछकर साफ़ भी कर देते हैं। कल ही तो माँ और पापा आपस में बातें कर रहे थे कि अगर मुकेश चाचा नहीं होते तो पापा का व्यवसाय इतना अच्छा नहीं चल रहा होता। सचमुच बहुत अच्छे हैं मुकेश चाचा, मेरे टेस्ट-पेपर्स देखकर मेरी पीठ थपथपाते हैं और खूब शाबाशी देते हैं। त्योहारों और बर्थडे पर मेरे लिये कपड़े भी लाते हैं। पर सच कहूँ तो इस बार दिवाली पर जो कपड़े उन्होंने दिये हैं वो थोड़े छोटे और कसे हुए हैं। शायद खरीदते हुए उन्होंने ध्यान नहीं दिया होगा।”, सोचते हुए दस वर्षीय पूर्णिमा आईने के सामने खड़ी होकर लिपस्टिक लगाने लगी।

उसके मामा का फ़ोन आया था कि नानी की तबीयत अचानक बिगड़ गयी है और उन्होंने अपनी बेटी से मिलने की इच्छा जताई है। पूर्णिमा के माँ-पापा आज रात वहीं रुकने वाले थे। फ़ाइनल एग्ज़ाम होने के कारण पूर्णिमा को मुकेश चाचा के ज़िम्मे छोड़ना पड़ा था।

“देखिये मैंने आपकी दी लिपस्टिक लगा ली, अब तो मुझे वो बार्बी वाली कहानी सुनायेंगे न”, पूर्णिमा चहकते हुए बोली।

मुकेश चाचा ने पूर्णिमा को अपनी गोद में बिठाया और धीरे-धीरे सहलाते हुए कहानी सुनाने लगे। न जाने कब पूर्णिमा की आँख लग गयी पर नींद में उसे अजीब सा महसूस हो रहा था। असहजता और घबराहट में घिरी बच्ची से अपनी आँखें भी न खोली गयीं। जैसे-तैसे सुबह हुई।

माँ-पापा के लौटते ही पूर्णिमा दौड़कर अपनी माँ से लिपट गयी और फूट-फूट कर रोने लगी। माँ ने बहुत पूछा पर पूर्णिमा थी कि कुछ बोल ही नहीं रही थी।

“क्यों गयी थी…मुझे यहाँ…यहाँ पर अकेले छोड़ कर मुझे…रात को क्यों नहीं आई तुम…जब इतने सारे साँप मेरे ऊपर एक साथ चढ़ गए थे, मैं कितनी डरी हुई थी…मुकेश चाचा भी बारबार यही कह रहे थे कि अपनी आँखें मत खोलना वरना साँप काट लेंगे। प्रॉमिस करो कि कभी ऐसे छोड़ कर नहीं जाओगी”, पूर्णिमा की बातें समझते माँ को देर न लगी। उन्होंने तय कर लिया था कि इस बार वो चुप नहीं रहेंगी वरना पूर्णिमा भी उसी विकृत मानसिकता का शिकार हो सकती है जो आज भी उसकी माँ को अंदर ही अंदर कचोटता है।

 

शाल्वी की कलम से निकली यह भावनात्मक रचना

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