हमारे घर-आंगन में फुदकने वाली गौरैया कहीं गुम हो गई है। जिसकी चहचहाहट में प्रकृति का संगीत सुनाई देता था वो अब मुश्किल से दिखाई देती है। कहां गई और क्यों गई गौरैया? अब उसे वापस बुलाने का कोई रास्ता है, भी या नहीं?

‘ओ री चिरैया… अंगना में फिर आ जा रहे’। स्वानंद किरकिरे का लिखा यह गीत गौरैया दिवस पर सबसे ज्यादा याद आता है। आप भी याद कीजिए, अंतिम बार आपने गौरैया को कब देखा था। कहां देखा था। वो गौरैया जिसके बिना हमारे बचपन की यादें अधूरी हैं, आज कहीं खो गई है।

पक्षी वैज्ञानिकों की मानें तो गौरैया की संख्या 60 से 80 फीसद तक कम हो गई है। इस चिंताजनक स्थिति को देखते हुए साल 2010 में 20 मार्च को पहली बार गौरैया दिवस मनाया गया। ताकि लोगों को इस पक्षी के संरक्षण के प्रति जागरूक किया जा सके।

वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट के समीर सिन्हा बताते हैं, गौरैया के बच्चों का भोजन शुरूआती दस-पंद्रह दिनों में सिर्फ कीड़े-मकोड़े ही होते है, लेकिन आजकल लोग खेतों से लेकर अपने गमले के पेड़-पौधों में भी रासायनिक पदार्थ का उपयोग करते हैं। जिससे ना तो पौधों को कीड़े लगते हैं और ना ही इस पक्षी का समुचित भोजन मिल पाता है।

लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि गौरैया से बढिय़ा नैचुरल मैकेनिज्म आपको मिल नहीं सकता है। यदि फसल या पेड़-पौधे में कीड़े-मकौड़े पनप भी रहें हैं तो उसे खाने के लिए गौरैया के बच्चे हैं। यदि रासायनिक खादों का प्रयोग बंद कर दिया जाए तो गौरैया अपने-आप ही बच जाएंगे। इसके अलावा बदलते घर के मॉडल के कारण गौरैया को घोंसला बनाने का ठिकाना नहीं मिल रहा है।

बिहार की राजकीय पक्षी है गौरैया

बिहार में गौरैया को संरक्षण देने के उद्देश्य से इसे राजकीय पक्षी घोषित किया गया है। कला, संस्कृति एवं युवा विभाग की ओर से गौरैया नाम से पत्रिका भी प्रकाशित की जाती है। बिहार के साथ कुछ अन्य राज्यों ने भी गौरैया को राजकीय पक्षी घोषित किया है, लेकिन सभी जगह गौरैया का वही हश्र है। कोई खास या बड़ी पहल अब तक नहीं दिखाई दी है।

अब नहीं दिखता वो वात्सल्य

पहले यह चिडिय़ा जब अपने बच्चों को चुग्गा खिलाया करती थी तो इंसानी बच्चे इसे बड़े कौतूहल से देखते थे, लेकिन अब तो इसके दर्शन भी मुश्किल हो गए हैं। पक्षी विज्ञानी के अनुसार गौरैया के संरक्षण के उचित प्रयास नहीं किए गए तो हो सकता है कि गौरैया इतिहास बन जाए और भविष्य की पीढिय़ों को यह देखने को ही न मिले। ब्रिटेन की ‘रॉयल सोसायटी ऑफ प्रोटेक्शन ऑफ बर्डस ने भारत से लेकर विश्व के विभिन्न हिस्सों में अनुसंधानकर्ताओं द्वारा किए गए अध्ययनों के आधार पर गौरैया को ‘रेड लिस्ट’ में डाला है।

एक साथ तीन अंडे देती है गौरैया

गौरेया ‘पासेराडेई’ परिवार की सदस्य है, लेकिन कुछ लोग इसे ‘वीवर फिंच’ परिवार की सदस्य मानते हैं। इनकी लम्बाई 14 से 16 सेंटीमीटर होती है तथा इनका वजन 25 से 32 ग्राम तक होता है। एक समय में इसके कम से कम तीन अंडे होते हैं। गौरेया अधिकतर झुंड में ही रहती है। भोजन तलाशने के लिए गौरेया का एक झुंड अधिकतर दो मील की दूरी तय करता है। यह पक्षी कूड़े में भी अपना भोजन खोज लेते हैं।

ऐसे बचाएं गौरैया को

– घरों में कुछ ऐसे स्थान उपलब्ध कराने चाहिए, जहां वे आसानी से अपने घोंसले बना सकें। इसके लिए आप अपने घर में वेंटिलेटर का डिजाइन बनवाएं। जहां वे घोसला बना सकें।

– घोंसले में गौरैया द्वारा दिए गए अंडे व बच्चे को हमलावर पक्षियों से बचाने की जरूरत है। इसके लिए जब गौरैया अंडा जन्म दें, तब खासतौर उसकी देखभाल करने की जरूरत है।

– फ्लैट या अपार्टमेंट रहने वाले लोग गमलों के पास पानी रखें। साथ में गौरैया को चुगने के लिए कुछ अनाज के दाने भी रख दें। यह यदि हर घर-आंगन में होने लगे तो गौरैया हमारे दुनिया में फिर से लौट आएगी।

एक्सपर्ट कमेंट

गौरैया को संरक्षित करने के लिए घरों में नेस्ट बॉक्स लगाने की जरूरत है। जहां वे बच्चे को जन्म दे सके। खेतों में पेस्टीसाइड्स के अधिक प्रयोग से गौरैया के बच्चों को खाना नहीं मिल रहा है। इस कारण गौरैया का अंडा समय पर परिपक्व नहीं हो पाता है। बच्चा जन्म लेने से पहले ही मर जाता है।

समीर सिन्हा, पर्यावरविद वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट

हनीफ चाचा के आशियाने में गौरैया का ठिकाना

करबिगहिया पुल के नीचे 90 वर्षीय मोहम्मद हनीफ ने पक्षियों का बसेरा बनाकर रखा है। 2006 से वे इस नेक काम में लगे हैं। हनीफ के बेटे मोहम्मद नसीम और असीम भी उनका इस काम में सहयोग करते हैं। दोनों बताते हैं कि पिता ने पुल के नीचे फल की दुकान खोली थी। पुल की सीलिंग के पास पिता ने फल के कार्टन को काटकर पक्षियों का आशियाना बना दिया। दुकान पर आने के बाद पिता पक्षियों को दाना-पानी देने के साथ उनके लिए एक कटोरे में पानी भी रख देते। चिडिय़ों की झुंड में ज्यादातर गौरैया और कबूतर होते।

हनीफ कहते हैं, चिडिय़ों को दाना-पानी देकर मन प्रसन्न होता है। ईश्वर ने सभी को जीने का हक दिया है। गर्मी के दिनों में चिडिय़ों को काफी परेशानी होती है। ऐसे में थोड़ा सा प्रयास करें तो उनका जीवन बच सकता है। किसी भी जीव को पानी पिलाना सबसे बड़ा पुण्य माना जाता है।

बेटा असीम कहता है, पिता की तबियत खराब होने के कारण अब वे दुकान पर कम आते हैं। उन्होंने घर में भी चिडिय़ों का आशियाना बनाकर रखा है। वहां भी बड़ी संख्या में गौरैया व अन्य पक्षियों का बसेरा है।

नसीम कहते हैं, फल खरीदने के दौरान जो भी लोग हमारे पास आते हैं उन्हें चिडिय़ों को दाना-पाना देने की सलाह देते हैं। कुछ लोग इन बातों से प्रेरित होकर अपने घरों की छतों पर चिडिय़ों के लिए पानी रख रहे हैं।

यहां होती है चिडिय़ों की धमाचौकड़ी

बोरिंग रोड निवासी छोटू को बर्ड मैन कहना गलत नहीं होगा। उनके यहां पक्षियों का पूरा संसार है। हर दुर्लभ प्रजाति के पक्षियों का बसेरा हैं। जहां तक नजर दौड़ाइए, वहां तक अलग-अलग प्रजाति के पक्षी उछलते-कूदते नजर आते हैं। यह घर कम पक्षियों का मिनी जंगल लगता है। छोटू इन पक्षियों के साथ सुबह की चाय से लेकर रात का डिनर तक करते हैं। छोटू बताते हैं, मुझे बचपन से पक्षी आकर्षित करते हैं। पिछले तीन सालों से अपने यहां अलग-अलग प्रजाति की पक्षियों की दुनिया बसायी है। सिल्वर डभ, पहाड़ी तोता, लालमुनिया जैसे आकर्षक पक्षी हमारे यहां हैं। इसके अलावा विदेशी गौरैया भी है।

पक्षियों की चहचहाहट से खुलती है नींद

छोटू व उनके परिवार वालों की नींद इन पक्षियों की चहचहाहट से खुलती है। छोटू बताते हैं, उनके घर का बरामदा फ्री फॉर ऑल है। यहां हमारे घर के पक्षी से लेकर बारह की गिलहरी कभी-कभार गौरैया आदि सभी मिलकर धमाचौकड़ी मचाते हैं। उनके यहां ऑस्ट्रेलियन लव बर्ड की प्रजाति लूटिनियो, रोजी सी, बडीज आदि पक्षी हैं। वे कहते हैं, मोहल्ले में मोबाइल के बड़े-बड़े टॉवर होने के कारण इन दिनों गौरैया नहीं दिखती है। छोटू को इन पक्षियों से बहुत लगाव है। वे इन सभी पक्षियों को समय-समय पर मक्का, हरा चना, पुदीना और हरी सब्जी लाकर देते रहते हैं। ताकि पक्षियों को उचित पोषण मिलता रहे।

Input : Dainik Jagran

 

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